कश्मीर में पेपियर-माचे और डोडो कला का पुनरुद्धार
| श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| घटना | डोडो श्रीनगर, कश्मीर में एक लोकप्रिय पेपियर-माचे उत्पाद बन गया है। |
| मुख्य बिंदु | |
| शिल्पकला और उत्पादन | - बड़े पेपियर-माचे डोडो बनाने में 5-10 दिन लगते हैं। |
| - डिजाइनों में फूलों और जंगलों के मोटिफ्स होते हैं, जो डोडो के विलुप्त होने को उजागर करते हैं। | |
| पेपियर-माचे का इतिहास | - उत्पत्ति: 15वीं शताब्दी, सुल्तान ज़ैन-उल-आबिदीन द्वारा शुरू किया गया। |
| - वस्तुएं: फूलदान, कटोरे, कप, बक्से, ट्रे, लैंप बेस। | |
| - डिजाइन: हज़ारा पैटर्न, गुल-ए-विलायत पैटर्न। | |
| - सुरक्षा: 1999 के भौगोलिक संकेत अधिनियम के तहत संरक्षित। | |
| डोडो | |
| वैज्ञानिक नाम | राफस कुकुलाटस |
| विशेषताएं | भूरे रंग के पंख, बड़ी हुकनुमा चोंच। |
| प्राकृतिक आवास | मॉरीशस के मूल निवासी, जंगलों में रहते थे। |
| विकासवादी इतिहास | शिकारियों की अनुपस्थिति के कारण उड़ान रहित, मजबूत दौड़ने की क्षमता। |

